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हिन्दी ही हमारी पहचान है

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विजय लक्ष्मी पारीक की हिन्दी दिवस पर विशेष काव्य प्रस्तुति

मातृभाषा निज देश का मान है,
हिन्दी बिन हम भारतीयों की क्या पहचान है।
एक सूत्र में प्रेम से पिरोया है,
बना वटवृक्ष अक्षरों का जो बीज बोया है।
चलता रहता अनवरत भाषा का निर्माण है,
हिन्दी बिन हम भारतीयों की क्या पहचान है।
गागर में सागर एक शब्द भर देता है,
प्रकृति को और अधिक श्रृंगारित कर देता है।
कैसे आंकोगे एक शब्द का क्या दाम है,
हिन्दी बिन हम भारतीयों की क्या पहचान है।

आत्मसात हर भाषा को स्वयं में किया है,
आदिकाल से आधुनिक तक हर युग में जिया है।
मिटी सभ्यताएं किंतु जारी हिन्दी का उत्थान है।
हिन्दी बिन हम भारतीयों की क्या पहचान है।
रस, छंद, अलंकार, सौंदर्य बढ़ाते हैं,
लेखन शैली के स्वर उच्च स्तर पर ले जाते हैं।
लगता कर्णप्रिय निज भाषा का ही गान है,
हिन्दी बिन हम भारतीयों की क्या पहचान है।
नित परिवर्तन के साथ हिन्दी ढल ही जाती है,
बदले बोलियां हिन्दी चल ही जाती है।
बसते हिन्दी में ही राष्ट्र के प्राण हैं,
हिन्दी बिन हम भारतीयों की क्या पहचान है।

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